माँ: पुस्तक २ (अध्याय ३ और ४)

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माँ: पुस्तक २ (अध्याय ३ और ४)

जैसे-जैसे जया उस क्रूर नियति की परतों को खोलती है जिसने उसे और उसके नवजात शिशु को जकड़ रखा है, उसकी दुनिया बिखरने लगती है। वह एक ऐसे अंतहीन और विनाशकारी चक्र में फंस जाती है, जहाँ से निकलने का हर रास्ता बंद नज़र आता है। वह अपने बच्चे को उस गहराते अंधेरे से बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करती है, लेकिन हर छोटी जीत की एक भयानक कीमत चुकानी पड़ती है। अपने अस्तित्व को बचाने की इस जंग में उसे अपनी मानसिक शांति, अपनी हिम्मत और अंततः अपनी आत्मा के टुकड़ों को कुर्बान करना पड़ता है।

समय बीतता है, पर खतरा नहीं।

जब वह खतरा दोबारा लौटता है, तो बिना किसी चेतावनी के।

आज उसी खतरे के सामने खड़े होकर, जया अपनी बची-कुची हिम्मत जुटाती है और यश के सामने उस उलझी हुई सच्चाई का खुलासा करती है। लेकिन इस कबूलनामे से उसे कोई राहत नहीं मिलती। इसके विपरीत, जो थोड़ा-बहुत सुकून बचा था, वह भी बिखर जाता है और उनके चारों ओर का शोर और गहरा हो जाता है। जब हालात उसके काबू से बाहर होने लगते हैं, तो जया किस्मत को अपने पक्ष में मोड़ने की एक हताश कोशिश में एक ऐसा फैसला लेती है जिसे बदला नहीं जा सकता। वह एक ऐसे काले रहस्य को दफन कर देती है, जिसके बारे में वह उम्मीद करती है कि वह कभी दुनिया के सामने नहीं आएगा।

लेकिन नियति की कुछ और ही योजना है।

PAGES: 103

SIZE: 6.9 x 9.8 inches

PRINT INK: Standard Black and White Print

PUBLISHER: OSBKU

RATED: M (mature content) 18+

ISBN Number : 978-93-5811-973-2

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